देवउठनी एकादशी 2025: चार महीने बाद फिर जागेंगे भगवान विष्णु, कब करें व्रत और तुलसी विवाह?


देवउठनी एकादशी 2025: चार महीने बाद फिर जागेंगे भगवान विष्णु, कब करें व्रत और तुलसी विवाह? यहां पढ़ें पूरी जानकारी

नई दिल्ली। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी, जिसे हरि प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है, इस वर्ष विशेष संयोग लेकर आ रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योग-निद्रा से जागते हैं और इसके साथ ही चातुर्मास का समापन हो जाता है। जैसे ही श्रीहरि की जागृति होती है, शुभ एवं मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत हो जाती है। विवाह, गृह प्रवेश और अन्य संस्कारिक कर्म इसी दिन से दोबारा प्रारंभ हो जाते हैं।

राधे राधे हरे कृष्णा। भक्तजन ध्यानपूर्वक सुनिए। आज की यह जानकारी केवल एक धार्मिक दिन की सूचना भर नहीं है। यह वह दिव्य रहस्य है जो स्वयं भगवान विष्णु की योग निद्रा से जागृति से जुड़ा हुआ है। कार्तिक मास, शुक्ल पक्ष की वह पावन एकादशी जिस दिन स्वयम् श्री हरि वोष्णु चार महीनों की योग निद्रा से जागते हैं और संपूर्ण सृष्टि में पुनः शुभता, मंगल कार्य, और आनन्द का प्रवाह आरंभ होता है। इस एकादशी को हरि प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी कहा जाता है। जो भी भक्त पूरे श्रद्धा भाव से इस दिन व्रत करता है उसे अक्षय पुण्य प्राप्त होता है और मोक्ष मार्ग की प्राप्ति होती है। यह केवल लोक आस्था नहीं है, बल्कि स्वयं शास्त्रों में इसका उल्लेख मिलता है कि इस दिन किया गया एक छोटा सा भक्तिपूर्ण कार्य भी हजार गुना अधिक फल देता है।

चार महीनों से भगवान विष्णु योग निद्रा में रहते हैं और इस पूरे समय में कोई भी शुभ मांगलिक कार्य नहीं किया जाता। विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ संस्कार, सभी अवरुद्ध रहते हैं, क्योंकि देवता निद्रा में रहते हैं। जैसे ही विष्णु जागते हैं वैसे ही शुभता का आरम्भ होता है, इसी कारण इस दिन तुलसी विवाह का भी अत्यंत शुभ विधान है। लक्ष्मी स्वरूपा तुलसी का विवाह नारायण स्वयं से होता है। इसलिए यह दिन अति मंगलकारी, अति पवित्र और अत्यंत फलदायी माना गया है।

परंतु इस वर्ष एक विशेष स्थिति बन रही है। क्योंकि एकादशी तिथि दो दिनों तक पड़ रही है, ऐसे में भक्तजन के मन में यह शंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि व्रत किस दिन रखा जाए। शास्त्र कहता है कि यदि एकादशी दो दिन पड़े तो शुद्ध एकादशी वही मानी जाती है जो द्वादशी तिथि को स्पर्श करे। ऐसी एकादशी को ही मोक्षप्रद एकादशी कहा गया है और वैष्णव संप्रदाय के भक्त उसी दिन व्रत रखते हैं।

इसके साथ ही इस बार भद्रा भी लगी रहेगी। भद्रा का वास कहाँ रहेगा, यह किन कार्यों पर प्रतिबंध लगाएगी, यह जानना भी अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि भद्रा में गलत कार्य करने पर शुभ फल की अपेक्षा विपरीत परिणाम प्राप्त हो सकता है। हरिवासर का समय कब समाप्त होगा, व्रत पारण कब किया जाएगा, किस समय पूजा उत्तम मानी जाएगी, तुलसी विवाह कब करना अधिक लाभकारी रहेगा, यह सभी प्रश्न आपके मन में होंगे और उनके उत्तर आज आप विस्तार से जानेंगे।

इस पावन दिन की एक भी जानकारी गलत हुई तो संपूर्ण पुण्य फल प्रभावित हो सकता है। इसलिए भक्तो, वीडियो को पूरा और ध्यान से देखें, क्योंकि अंत तक आपको वह मार्गदर्शन प्राप्त होगा जिसके बाद इस देवउठनी एकादशी का आपका व्रत पूर्णत: फलदायी और धर्मसम्मत होगा। वीडियो शुरू करने से पहले कमेंट बॉक्स में एक बार ऊँची आवाज़ में लिखिए: जय श्री हरि, जय तुलसी माता

दो दिन पड़ रही है एकादशी, कौन सी है शुद्ध तिथि?

पंचांग गणना के अनुसार इस वर्ष एकादशी तिथि 1 नवंबर शनिवार सुबह 9:12 बजे से प्रारंभ होकर 2 नवंबर रविवार सुबह 7:31 बजे तक रहेगी। ऐसे में एकादशी दो दिन पड़ने के कारण श्रद्धालुओं के मन में व्रत को लेकर कन्फ्यूजन भी दिखाई दे रहा है।

धर्मशास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि जब एकादशी दो दिनों तक रहे, तो द्वादशी तिथि को स्पर्श करने वाली एकादशी को शुद्ध और मोक्ष प्रदान करने वाली माना जाता है। इसलिए वैष्णव संप्रदाय के भक्त एवं मोक्ष-कामना वाले श्रद्धालु 2 नवंबर रविवार को ही व्रत रखेंगे।

हालांकि गृहस्थ लोग इच्छा अनुसार 1 या 2 नवंबर, दोनों में किसी भी दिन व्रत कर सकते हैं।


तुलसी विवाह का शुभ समय

देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह करने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु और तुलसी माता का विवाह संपन्न कराया जाता है। यह विवाह लक्ष्मी प्राप्ति और सुख-समृद्धि का अत्यंत शुभ योग माना जाता है।

तुलसी विवाह के मुहूर्त:
1 नवंबर: शाम 5:36 से 6:54 बजे तक
2 नवंबर: शाम 5:35 से 6:53 बजे तक

यदि किसी कारणवश इन दोनों दिनों में विवाह न हो सके, तो कार्तिक पूर्णिमा तक ब्रह्म मुहूर्त या गोधूलि बेला में भी तुलसी विवाह किया जा सकता है।


भद्रा काल के कारण सावधानी भी आवश्यक

इस बार भद्रा का वास मृत्युलोक में रहेगा, जिसे शुभ कार्यों के लिए प्रतिकूल माना जाता है।
• भद्रा काल प्रारंभ: 1 नवंबर रात 8:27 बजे
• भद्रा समाप्त: 2 नवंबर सुबह 7:31 बजे

इस अवधि में शुभ कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है।


व्रत का पारण कब?

जो भक्त 1 नवंबर शनिवार को व्रत रखते हैं, वे अगले दिन हरिवासर की समाप्ति के बाद पारण करेंगे।
• हरिवासर समाप्ति: 2 नवंबर दोपहर 12:30 बजे
• पारण का शुभ समय: 1:11 PM से 3:23 PM

ध्यान रहे कि इस अवधि से पहले अन्न-जल ग्रहण नहीं करना चाहिए।


मुहूर्त और राहुकाल की जानकारी

1 नवंबर शनिवार
• ब्रह्म मुहूर्त: 5:00 – 5:48 AM
• सूर्यास्त: 5:44 PM
• राहुकाल: 9:00 – 10:30 AM

2 नवंबर रविवार
• ब्रह्म मुहूर्त: 5:01 – 5:49 AM
• राहुकाल: 4:30 – 6:00 PM


क्यों महत्वपूर्ण है यह एकादशी?

धार्मिक शास्त्रों में लिखा है कि इस एकादशी का व्रत रखने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इससे
• पापों का नाश
• मनोकामनाओं की पूर्ति
• तथा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है

इसी कारण इसे वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक माना गया है।


आस्था और उत्सव का महापर्व

देवउठनी एकादशी के साथ ही घरों में मांगलिक उत्साह लौट आएगा। मंदिरों में विशेष सजावट, अखंड भजन और तुलसी विवाह के आयोजन भक्तों की आस्था और उल्लास का प्रतिनिधित्व करेंगे।

श्रद्धालु पूर्ण श्रद्धा और नियमों के साथ व्रत-पूजन कर इस दिन की दिव्यता को धारण कर सकें, इसी भाव के साथ यह धार्मिक जानकारी श्रद्धेय है।



राधे राधे। हरे कृष्णा।

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